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कोई केह दे उनसे जाकर, की छत पे ना जाया करे ..
शहर मेँ बेवजह, ईद की तारीख बदल जाती है..!
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"ना पूछ मेरे सब्र की इंतेहा कहाँ तक हैं,
तू सितम कर ले, तेरी हसरत जहाँ तक हैं,
वफ़ा की उम्मीद, जिन्हें होगी उन्हें होगी,
हमें तो देखना है, तू बेवफ़ा कहाँ तक हैं" !!
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हो बेखबर आज, बस युही रहेना
जानने से कुछ मिलता नहीं, बस यही कहेना……
दो पल जिसमे खुशीया मिले, उसको ही जीलो
खेल शकता है खुदा जज्बात से हमारे, पर हमें नहीं है खेलना.......
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तनहा रहेने का भी अपना मज़ा है दोस्तों.......
यकीन होता है की कोई छोड़कर नहीं जायेगा,
और
उम्मीद नहीं होती किसी के लौट आने की...!!
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वो कहते हैं सोच लेना था मुहब्बत करने से पहले।
अब उनको कौन समझाए
सोच कर तो साजिश की जाती हैं मुहब्बत नहीं।।
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